Home राशिफल नहीं किया यह उपाय तो खतरे में है इंसान का अस्तित्व

नहीं किया यह उपाय तो खतरे में है इंसान का अस्तित्व

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विकेश कुमार बडोला
मनुष्य का जन्म पृथ्वी पर सबसे विचारवान प्राणी के रूप में हुआ है। विचारवान होने से तात्पर्य है- परस्पर प्रेम, कल्याण भावना के साथ जीवन जीने और परोपकार की राह पर निरंतर आगे बढ़ते रहना। विचारवान होने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है निरंतर आत्मपरीक्षण करना। इस प्रक्रिया में व्यक्ति के भीतर वे सभी प्राकृतिक सद‌्गुण एकत्र होने लगते हैं, जो वैचारिक श्रेष्ठता के लिए अनिवार्य हैं। ऐसा भी नहीं है कि मनुष्य इन गुणों की प्रेरणा के लिए स्वयं ही प्रेरणा का एकमात्र स्रोत होगा। इस ध्येय की पूर्ति के लिए ईश्वर प्रकृति के माध्यम से मनुष्य के समक्ष प्रतिदिन अनेक सुंदर, सकारात्मक और जीवनोपयोगी उदाहरण प्रस्तुत करता रहता है।

प्रकृति के अंश सूर्य, चंद्रमा, सितारे, नभ, पृथ्वी, मिट्टी, वन, वृक्ष, लताएं, पुष्प, हवा, अग्नि, जल, नदियां, नहरें, तालाब, समुद्र, पर्वत, पठार, खाद्यान्न से भरे हुए खेत-खलिहान, विभिन्न पशु-पक्षी सभी अपने व्यवहार से हमें क्षण-प्रतिक्षण कोई न कोई उपयोगी शिक्षा अवश्य देते हैं। जब भी मानव प्रकृति की विभिन्न घटनाओं को आत्मसात कर उनसे मानवोपयोगी शिक्षा ग्रहण करता है तो इससे जीवन-जगत का कल्याण होता है। मनुष्य के तन-मन के लिए आवश्यक सभी वस्तुएं और अनुभव प्रकृति से ही उत्पन्न हो रहे हैं। इसके लिए मनुष्य को प्रकृति के प्रति सदैव कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए। उसके लिए पूजा-अर्चना और अन्य पौराणिक धर्म-कर्म करने चाहिए। यह करके हम प्रकृति को प्रसन्न करते हैं और उसका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

मनुष्य का प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना, उसे मान-सम्मान देना और उसके अनुसार अपनी दिनचर्या व्यतीत करना तभी संभव होता है, जब वह निरंतर विचारवान हो। लेकिन देखा जा रहा है कि मनुष्य अपनी इस परंपरागत विशेषता को भूल गया है। वह भौतिक साधनों-संसाधनों के उपभोग में इतना अधिक लिप्त है कि भौतिक उपलब्धियों की जननी प्रकृति की निरंतर उपेक्षा कर रहा है। प्रकृति और इसके अंशों, तत्वों व विशिष्टताओं की केवल उपेक्षा ही नहीं हो रही, बल्कि मनुष्य की भौतिक लिप्साओं के बढ़ते जाने से प्रकृति पर संगठित और राजनीतिक अत्याचार भी बढ़ रहा है।

भौतिक विकास के लिए उसका बेशुमार दोहन हो रहा है। निस्संदेह प्रकृति-प्रेमी मनुष्यों के लिए ये परिस्थितियां गहन दुख और निराशा उत्पन्न कर रही हैं, लेकिन इन आत्मघाती परिस्थितियों में भी हताश-निराश नहीं होना चाहिए। प्रकृति-प्रेमी मनुष्यों को ऐसे में अपनी विचारशक्ति बढ़ानी चाहिए। संतुलित स्वभाव, निर्मम भौतिकता से अलगाव और प्रकृति के साथ सद‌्भावना बढ़ाकर मनुष्य निश्चित रूप से प्राकृतिक व्यवस्था को पुनः प्रकृतिमूलक बनाने में सहायक हो सकता है।

अगर इंसान प्रकृति को लेकर सचेत नहीं हुआ तो उसका अस्तित्व खतरे में आ सकता है। अपनी भौतिक इच्छाओं का आकलन करते हुए मनुष्य इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए सचेत हो सकता है कि वह साधनों-संसाधनों पर अपनी निर्भरता कम करेगा, प्रकृति के लिए हानिकारक गतिविधियों का गंभीर विरोध करेगा और जीवन-पर्यन्त प्रकृति में विद्यमान साधनों का सदुपयोग करेगा। ऐसे विचार यदि प्रत्येक मनुष्य को आंदोलित करेंगे तो निश्चित रूप में प्रकृति का स्वभाव वापस लौट आएगा। जगत में धर्म और ज्ञान का श्रेष्ठ आचरण यही होगा कि सभी मनुष्य प्रकृति पर हो रहे अत्याचार को रोकने में तत्पर हो और प्रकृति के मूल स्वरूप को पुन: स्थापित करने में अपना योगदान दे।

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