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शांति और युद्ध…जो भी हो, अटल जी उसे मन की दृढ़ता से लेते थे: पूर्व आर्मी चीफ 

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शांति और युद्ध, जो भी रहा, स्व. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उसे सदैव मन की दृढ़ता से लिया।कारगिल की लड़ाई के दौरान उनकी गंभीरता, सादगी और अविलंब निर्णय लेने की क्षमता, इन तीनों का अदभुत सामंजस्य देखने को मिला। वे प्रधानमंत्री थे, हमारे लिए उनसे बार-बार मिलना संभव नहीं था, मगर जैसे ही उनके मन में कोई सवाल उठता, वे खुद ही अपने सरकारी आवास पर आने का बुलावा भेज देते थे।कारगिल की लड़ाई के दौरान सेना अध्यक्ष रहे वीपी मलिक ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अपने कई अनुभवों को सांझा किया है। मलिक के अनुसार, जब लड़ाई चल रही थी तो आठ जुलाई 1999 को अटल जी ने मुझे अपने आवास पर बुलाया। जब मैं पीएम आवास पर पहुँचा तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र वहां मौजूद थे। अटल जी बोले, पाकिस्तान अपनी सेना एलओसी से हटाने के लिए तैयार है।

अटल जी, अपनी बात पर मेरी प्रतिक्रिया जानना चाहते थे।मैने कहा, यह भारतीय सेना को स्वीकार नहीं है। आमतौर पर किसी लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री के सामने इस तरह से जवाब देने की परपंरा नहीं होती है, लेकिन अटल जी को बातें घुमा फिराकर करने वाले पसंद नहीं थे। जब देश की सुरक्षा का मामला सामने हो तो वे ऐसे व्यक्ति को कतई बर्दास्त नहीं करते। मैने बहुत ही साफगोई के साथ जवाब दिया, हमारी सेना जानमाल का काफी नुकसान उठा चुकी है। अब हमने उसे इलाके के बड़े भाग को खाली करा लिया है, जिस पर पाकिस्तान की सेना ने कब्जा कर लिया था। अब माहौल हमारे पक्ष में है, ऐसे में हम दुश्मन को आसानी से क्यो भाग निकलने दें।

अटल जी ने कोई सवाल नहीं किया। सिर्फ इतना कहा, बताओ आप क्या कर सकते हैं। मैने भी तुरंत कहा, इसके लिए मुझे अपने सहयोगियों से सलाह करनी होगी। चीफ ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी, (सीओएससी) की राय लेने के बाद ही अंतिम तौर से कुछ कह सकूंगा। वाजपेयी जी मेरी ने एक-एक बात बहुत ग़ौर से सुनी। उनके पास कई सलाहकार थे, लेकिेन फिर भी वे मुझ पर पूर्ण भरोसा कर चल रहे थे। इसके बाद मैं पीएम आवास से बाहर निकल गया।

चलो बताओ, कितना समय लगेगा…  

थोड़ी देर बाद पीएम आवास से फ़ोन आया।पीएम ने मुझसे पूछा, चलो बताओ, कितना समय लगेगा घुसपैठियों को बाहर खदेड़ने में।
मेरा जवाब था, सर दो तीन सप्ताह लगेंगे। हालांकि मैंने एक सप्ताह रिजर्व में रखकर बात कही थी। अटल जी ने कहा, देखिये हम पहले ही नुकसान झेल चुके हैं। मैने पीएम से कहा, हम युद्ध जैसी स्थिति से गुजर रहे हैं। हमारा प्रयास है कि हम कम से कम नुकसान उठाकर बाकी बचे घुसपैठियों को बाहर कर दें। मैं पीएम को यह बात कहने से खुद को नहीं रोक सका कि आगे ऐसा नहीं होगा। इस पर वाजपेयी मुस्कुरा दिए। मैं चलने के लिए तैयार था कि प्रधानमंत्री जी ने मुझे पीछे से रोका। सुनो, हमें संवैधानिक जरूरतों के हिसाब से देखना, सोचना और करना है। चुनावों की घोषणा कभी भी हो सकती है।

जब अटल जी बोले, जाओ और करो….  

21 जुलाई 1999  को प्रधानमंत्री के साथ बैठक थी।मैने कहा, तब तक आॅपरेशन विजय सफल नहीं होगा, जब तक एलओसी से हमारी तरफ पाक की तीन पॉकेट खत्म नहीं हो जाती। आपकी मंजूरी के बिना यह संभव नहीं है, क्योंकि इसमें फोर्स का इस्तेमाल होगा। वाजपेयी जी ने कहा, जाओ और करो। पीएम की मंज़ूरी मिलते ही भारतीय सेना ने 25 जुलाई को तीनों पाकेट खाली करा दी। 27 जुलाई को प्रधानमंत्री ख़ुद मिलिटरी ऑपरेशन रूम में आए। उन्होंने सेना को बधाई दी।

…और पीएम ने तुरंत सलाह मान ली 

मैने अटल जी से कहा, आपको सेना के तीनों चीफ़ के साथ नियमित बैठक करनी चाहिए। पीएम ने यह सुझाव तुरंत मान लिया। उनसे पहले भी यह व्यवस्था नियमित नहीं थी और उनके प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भी यह प्रचलन में नहीं रख सकी। अटल जी बहुत स्पष्टवादी इंसान थे। कारगिल में एयरफ़ोर्स के इस्तेमाल पर उन्होंने कहा, जो भी करो, मगर अपनी सीमा में रह कर, एलओसी के पार नहीं जाना चाहिए।

शांति और युद्ध, जो भी रहा, स्व. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उसे सदैव मन की दृढ़ता से लिया।कारगिल की लड़ाई के दौरान उनकी गंभीरता, सादगी और अविलंब निर्णय लेने की क्षमता, इन तीनों का अदभुत सामंजस्य देखने को मिला। वे प्रधानमंत्री थे, हमारे लिए उनसे बार-बार मिलना संभव नहीं था, मगर जैसे ही उनके मन में कोई सवाल उठता, वे खुद ही अपने सरकारी आवास पर आने का बुलावा भेज देते थे।कारगिल की लड़ाई के दौरान सेना अध्यक्ष रहे वीपी मलिक ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अपने कई अनुभवों को सांझा किया है। मलिक के अनुसार, जब लड़ाई चल रही थी तो आठ जुलाई 1999 को अटल जी ने मुझे अपने आवास पर बुलाया। जब मैं पीएम आवास पर पहुँचा तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र वहां मौजूद थे। अटल जी बोले, पाकिस्तान अपनी सेना एलओसी से हटाने के लिए तैयार है।

अटल जी, अपनी बात पर मेरी प्रतिक्रिया जानना चाहते थे।मैने कहा, यह भारतीय सेना को स्वीकार नहीं है। आमतौर पर किसी लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री के सामने इस तरह से जवाब देने की परपंरा नहीं होती है, लेकिन अटल जी को बातें घुमा फिराकर करने वाले पसंद नहीं थे। जब देश की सुरक्षा का मामला सामने हो तो वे ऐसे व्यक्ति को कतई बर्दास्त नहीं करते। मैने बहुत ही साफगोई के साथ जवाब दिया, हमारी सेना जानमाल का काफी नुकसान उठा चुकी है। अब हमने उसे इलाके के बड़े भाग को खाली करा लिया है, जिस पर पाकिस्तान की सेना ने कब्जा कर लिया था। अब माहौल हमारे पक्ष में है, ऐसे में हम दुश्मन को आसानी से क्यो भाग निकलने दें।

अटल जी ने कोई सवाल नहीं किया। सिर्फ इतना कहा, बताओ आप क्या कर सकते हैं। मैने भी तुरंत कहा, इसके लिए मुझे अपने सहयोगियों से सलाह करनी होगी। चीफ ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी, (सीओएससी) की राय लेने के बाद ही अंतिम तौर से कुछ कह सकूंगा। वाजपेयी जी मेरी ने एक-एक बात बहुत ग़ौर से सुनी। उनके पास कई सलाहकार थे, लेकिेन फिर भी वे मुझ पर पूर्ण भरोसा कर चल रहे थे। इसके बाद मैं पीएम आवास से बाहर निकल गया।

चलो बताओ, कितना समय लगेगा…  

थोड़ी देर बाद पीएम आवास से फ़ोन आया।पीएम ने मुझसे पूछा, चलो बताओ, कितना समय लगेगा घुसपैठियों को बाहर खदेड़ने में।
मेरा जवाब था, सर दो तीन सप्ताह लगेंगे। हालांकि मैंने एक सप्ताह रिजर्व में रखकर बात कही थी। अटल जी ने कहा, देखिये हम पहले ही नुकसान झेल चुके हैं। मैने पीएम से कहा, हम युद्ध जैसी स्थिति से गुजर रहे हैं। हमारा प्रयास है कि हम कम से कम नुकसान उठाकर बाकी बचे घुसपैठियों को बाहर कर दें। मैं पीएम को यह बात कहने से खुद को नहीं रोक सका कि आगे ऐसा नहीं होगा। इस पर वाजपेयी मुस्कुरा दिए। मैं चलने के लिए तैयार था कि प्रधानमंत्री जी ने मुझे पीछे से रोका। सुनो, हमें संवैधानिक जरूरतों के हिसाब से देखना, सोचना और करना है। चुनावों की घोषणा कभी भी हो सकती है।

जब अटल जी बोले, जाओ और करो….  

21 जुलाई 1999  को प्रधानमंत्री के साथ बैठक थी।मैने कहा, तब तक आॅपरेशन विजय सफल नहीं होगा, जब तक एलओसी से हमारी तरफ पाक की तीन पॉकेट खत्म नहीं हो जाती। आपकी मंजूरी के बिना यह संभव नहीं है, क्योंकि इसमें फोर्स का इस्तेमाल होगा। वाजपेयी जी ने कहा, जाओ और करो। पीएम की मंज़ूरी मिलते ही भारतीय सेना ने 25 जुलाई को तीनों पाकेट खाली करा दी। 27 जुलाई को प्रधानमंत्री ख़ुद मिलिटरी ऑपरेशन रूम में आए। उन्होंने सेना को बधाई दी।

…और पीएम ने तुरंत सलाह मान ली 

मैने अटल जी से कहा, आपको सेना के तीनों चीफ़ के साथ नियमित बैठक करनी चाहिए। पीएम ने यह सुझाव तुरंत मान लिया। उनसे पहले भी यह व्यवस्था नियमित नहीं थी और उनके प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भी यह प्रचलन में नहीं रख सकी। अटल जी बहुत स्पष्टवादी इंसान थे। कारगिल में एयरफ़ोर्स के इस्तेमाल पर उन्होंने कहा, जो भी करो, मगर अपनी सीमा में रह कर, एलओसी के पार नहीं जाना चाहिए।

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